आषाढ़ी मेले की बग्वाल में केवल अधिकृत लोग ही लें भाग, बाराही शक्तिपीठ न्यास के अध्यक्ष ने बाहरी लोगों से परंपराओं में हस्तक्षेप न करने की अपील

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गूंज, चम्पावत। प्रसिद्ध अषाढ़ी मेले के दौरान आयोजित होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल को लेकर श्रद्धालुओं एवं स्थानीय लोगों से परंपराओं और निर्धारित नियमों का पालन करने की अपील की गई है। बग्वाल में केवल अधिकृत लोगों को ही भाग लेने का अनुरोध किया गया है।

मान्यता के अनुसार बग्वाल में भाग लेने वाले लोगों को देवता का माना जाता है, जबकि देवी के डोले को कंधे पर उठाने वाले व्यक्तियों को ‘डोलिया’ कहा जाता है। इस धार्मिक आयोजन में चार खाम और सात थोक के लोग परंपरागत रूप से भाग लेते हैं। बग्वाल में शामिल होने वाले लोग कई दिनों तक सात्त्विक भोजन, व्रत और शुद्ध दिनचर्या का पालन करते हुए इस अनुष्ठान से जुड़ते हैं।

स्थानीय लोगों के लिए बग्वाल, बग्वाल स्थल, डोली और जमानी में भाग लेना अपनी ओर से आहुति देने जैसा माना जाता है। वहीं, देवीधुरा का अषाढ़ी मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण उत्सव है। मेले में चौपाई, झोड़ा, भगनौले और छपेली जैसे लोकगीतों के माध्यम से देवी-देवताओं की आराधना की जाती है। इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी भक्ति और लोक परंपरा की झलक देखने को मिलती है।

बाहरी लोगों से परंपराओं का सम्मान करने की अपील

मेले को लेकर बाहर से आने वाले लोगों से विशेष रूप से अपील की गई है कि वे परंपराओं के साथ छेड़छाड़ अथवा अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। जो लोग बग्वाल में भाग लेने के लिए अधिकृत नहीं हैं या स्थानीय परंपराओं के अनुरूप शुद्ध तन-मन से इसमें शामिल होने की भावना नहीं रखते, उनसे बग्वाल के समय खोलिखांड मैदान से दूर रहने का अनुरोध किया गया है।

मान्यता है कि बग्वाल में यक्ष, गंधर्व, योगिनी और डाकिनी जैसी शक्तियां भी सम्मिलित होती हैं, जो आपस में रुष्ट हो सकती हैं। इसलिए श्रद्धालुओं से किसी भी प्रकार का प्रमाद न करने और धार्मिक भावनाओं व परंपराओं का पूर्ण सम्मान करने की अपील की गई है।

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