एमटेक का सपना छोड़ा, कानून को बनाया मिशन; गरीबों और बेसहारों की आवाज बनीं स्मृति जोशी

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गूंज, चम्पावत। एमटेक की डिग्री हासिल कर उत्कृष्ट अभियंता बनने का सपना देखने वाली स्मृति जोशी ने परिस्थितियों और अपने कटु अनुभवों से प्रेरणा लेकर कानून का रास्ता चुना। आज वह अधिवक्ता के रूप में गरीब और बेसहारा लोगों को न्याय की राह दिखाने के साथ ही आपसी विवादों को सुलझाकर परिवारों को टूटने से बचाने का प्रयास कर रही हैं। लोहाघाट के प्रतिष्ठित परिवार में जन्मी स्मृति को अपने दादा स्व. बीडी जोशी और पिता स्व. नरेश जोशी से समाज के प्रति संवेदनशील रहने की प्रेरणा मिली। स्वयं के साथ हुई एक घटना ने उन्हें कानून की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने ठान लिया कि छोटी-छोटी जमीन और पारिवारिक विवादों में वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने वाले लोगों को समझौते और आपसी संवाद का रास्ता दिखाएंगी।

स्मृति का कहना है कि कई बार मामूली विवाद को लेकर लोग वर्षों तक कोर्ट-कचहरी में पैसा और समय खर्च कर देते हैं। यदि यही विवाद समय रहते घर की चौखट पर आपसी समझ से सुलझ जाए तो परिवारों के रिश्ते भी बच सकते हैं और वर्षों में खर्च होने वाली रकम से लोग जमीन का एक टुकड़ा तक खरीद सकते हैं।

खास बात यह है कि ऐसे मामलों में स्मृति लोगों से किसी तरह की फीस लेने के बजाय उनका आशीर्वाद लेना पसंद करती हैं। कई मामलों में परिवारों के बीच समझौता कराने में मिली सफलता ने उनके हौसले को और बढ़ाया है। उनका मानना है कि उम्र छोटी होने के बावजूद यदि लोग उनकी बात को महत्व देकर आपसी समझ और दूरदृष्टि से निर्णय लेते हैं, तो इससे दो परिवारों को बिखरने से बचाया जा सकता है। स्मृति की यह पहल कानून को केवल मुकदमेबाजी तक सीमित रखने के बजाय समझौते, रिश्तों और सामाजिक सौहार्द का माध्यम बनाने की मिसाल पेश कर रही है।

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